वृंदावन में स्थित बांके बिहारी मंदिर भारत की सबसे रहस्यमई मंदिरों में से एक है मंदिर में स्थित श्री कृष्ण की यह प्रतिमा कहां से आई इसका रहस्य भी बड़ा ही रोचक है इस मंदिर के बारे में कई ऐसे अद्भुत किस्से हैं जिन्हें जानकर आप भी हैरानी में पड़ जाएंगे मथुरा से लगभग 15 किलोमीटर दूरी पर है वृंदावन धाम यमुना नदी किनारे बसा वृंदावन धाम श्री कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा स्थान है गोकुल में कंस के द्वारा भेजे गए राक्षसों के अत्याचारों से तंग आकर नंद बाबा श्री कृष्ण और अपने परिवार व कुटुंब के साथ वृंदावन धाम में रहने आए थे और एक लंबे समय तक श्री कृष्ण जी यहां रहे थे वृंदावन धाम में श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के कई प्राचीन मंदिर हैं और इन्हीं प्राचीन मंदिरों में से एक है श्री बांके बिहारी मंदिर इस मंदिर को भारत के सबसे रहस्यमई मंदिरों में से एक माना जाता है

दूर-दूर से लोग यहां आकर श्री बांके बिहारी जी का दर्शन करते हैं यह मंदिर का निर्माण  स्वामी हरिदास जी ने करवाया था स्वामी हरिदास जी प्राचीन समय के मशहूर गायक तानसेन के गुरु थे स्वामी हरिदास जी श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे वृंदावन में स्थित निधिवन में भजन गाकर श्री कृष्ण की भक्ति किया करते थे और स्वयं श्री राधा कृष्ण उन्हें दर्शन दिया करते थे एक बार स्वामी हरिदास जी को बिहारी जी की मूर्ति निकालने का स्वप्न में भगवान का आदेश हुआ तब उनकी आज्ञा अनुसार श्याम वर्ण छवि वाले श्री कृष्ण को धरती की गोद से बाहर निकाला गया यही सुंदर मूर्ति श्री बांके बिहारी जी के नाम से विख्यात हुई बांके बिहारी जी की मूर्ति में राधा और कृष्ण दोनों की छवि दिखाई देती है इसलिए मूर्ति पर आधा महिला और आधा पुरुष का श्रृंगार किया जाता है बांके बिहारी जी की छवि के मध्य स्थित अलौकिक प्रकाश की अनुभूति होती है जो कि बांके बिहारी जी में राधा तत्व का परिचायक है काफी लंबे समय तक श्री बांके बिहारी जी की यह प्रतिमा निधिवन में ही रही थी और काफी लंबे समय तक स्वामी हरिदास निधिवन में बांके बिहारी जी की प्रतिमा की सेवा करते रहे बाद में जब मंदिर का निर्माण हो गया तब इस प्रतिमा को इस मंदिर में स्थापित किया गया माना जाता है कि मंदिर में मूर्ति स्थापना के बाद एक दिन स्वामी हरिदास जी ने निधिवन में स्थित अपनी कुटिया में प्रातः काल उनके बिस्तर पर किसी को रजाई ओढ़कर सोते देखा यह देखकर स्वामी जी बोले कि मेरे बिस्तर पर कौन सो रहा है वहां श्री बांके बिहारी जी स्वयं सो रहे थे शब्द सुनते ही बांके बिहारी जी वहां से भाग निकले किंतु भी अपना चूड़ा और बंसी बिस्तर पर ही छोड़ गए इसके पश्चात जब श्री बांके बिहारी जी मंदिर के पुजारी ने मंदिर के कपाट खोले तो उन्हें श्री बांके बिहारी जी के पालने में जुड़ा और बंसी नजर नहीं आई जबकि मंदिर का दरवाजा बंद था इस पर सभी आश्चर्यचकित हो गए और स्वामी हरिदास जी के पास पहुंचे जहां श्री बांके बिहारी जी की बंसी और जो पाया गया इसे प्रमाणित होता है कि श्री बांके बिहारी जी ने निधिवन जाते हैं इसी कारण से प्रातः श्री बांके बिहारी जी की मंगला आरती नहीं होती क्योंकि रात्रि में रास करने बिहारी जी यहां आते हैं अतः प्रातः चयन में बाधा डालकर उनकी आरती करना अपराध माना जाता है

स्वामी हरिदास जी के दर्शन करने अनेकों सम्राट यहां आते थे एक बार दिल्ली के सम्राट अकबर स्वामी जी के दर्शन हेतु यहां आए थे श्री बांके बिहारी जी के दर्शनों के दौरान हर 2 मिनट के बाद पर्दा बंद कर दिया जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि बांके बिहारी जी के भक्तो वशीभूत हो जाते हैं बड़े नटखट है बिहारी जी जब कोई सच्चा भक्त उनकी आंखों में आंखें डाल कर निहारता है तो बांके बिहारी जी भक्तों के प्यार के वशीभूत होकर उसी के साथ चल देते हैं इसलिए इस मंदिर में आंखें बंद करके पूजा नहीं की जाती बल्कि उनकी आंखों में आंखें डाल कर उन्हें निहारा जाता है यहां भगवान श्री कृष्ण का दिव्य आवान राधा नाम की शांति पूर्वक मंत्रों के साथ किया जाता है बांके बिहारी मंदिर का सबसे रोचक तथ्य यह है कि इस मंदिर में कोई भी संख्या घंटी नहीं है माना जाता है कि बांके बिहारी जी को इन उपकरणों की आवाज पसंद नहीं है इस मंदिर में आकर भक्तों को अद्भुत शांति और आनंद की प्राप्ति होती है और पूरे साल यहां भक्तों का आगमन होता है चलिए अब आपको बताते हैं कि बांके बिहारी जी को बांके बिहारी जी क्यों कहा जाता है भगवान श्री कृष्ण की सभी प्रतिमाओं को बांके बिहारी जी नहीं कहा जाता केवल फोटो पर बांसुरी कमर कोटडा किए हुए एक पैर को दूसरे पैर के सामने रखी हुई मुद्रा वाली प्रतिमा को ही बांके बिहारी कहा जाता है बांके बिहारी जी के दर्शन प्रातः 9:00 बजे से 12:00 बजे तक और शाम 6:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक होते हैं

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