सुदर्शन चक्र को छोटा लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था सभी देवी देवताओं के पास अपनेअपने अलगअलग चक्र होते थे उन सभी के अलगअलग नाम भी थे शंकर जी के चक्र का नाम भवरेंदु विष्णु जी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवि का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है सुदर्शन चक्र ब्रह्मास्त्र के समान ही अचूक था हालांकि यह ब्रह्मास्त्र की तरह विध्वंसक तो नहीं था लेकिन इसका प्रयोग अति आवश्यक होने पर ही किया जाता रहा है क्योंकि यह एक बार छोड़े जाने पर दुश्मन को खत्म करके ही दम लेता था इस आयुध की खासियत यह थी कि से तेजी से हाथ से घुमाने पर यह हवा के प्रवाह से मिलकर प्रचंड वेग से अग्नि प्रज्वलित कर दुश्मन को भस्म कर देता था या यह एक भयानक  परमाणु बम ही था सुदर्शन चक्र के विज्ञान को भी अत्यंत गुप्त रखा गया है गोपनीयता इसलिए रखी गई होगी क्योंकि इस शस्त्र की जानकारी दूसरों को ना लग जाए अन्यथा गैरजिम्मेदार लोग इसका दुरुपयोग कर सकते थे महाभारत के बाद सुदर्शन चक्र का क्या हुआ और अब सुदर्शन चक्र कहां है 

      सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अंश था और इसे उसके अवतार ही धारण कर सकते थे यह अस्त्र एक साथ कई कार्य कर सकता था इसके निर्माण के पीछे भी अलगअलग मान्यताएं हे यह चांदी की सलाकाऊ से निर्मित था इसके ऊपरी और निचली सतह ऊपर लोहसून लगे हुए थे इसके साथ ही इसमें अत्यंत विषैले किस्म के विष भी थे इसके नाम से ही विपक्षी सेना में मौत का भय छा जाता था यह खुद जितना रहस्यमई है उतना ही इसका निर्माण और संचालन भी प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्री विष्णु को सौंप दिया था जरूरत पड़ने पर श्री विष्णु ने पार्वती जी को प्रदान किया भगवान श्री कृष्ण के पास यह देवी की कृपा से आया एक मान्यता है कि भगवान विष्णु को या सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला था हमारे पुराणों में सुदर्शन चक्र का वर्णन अलग ही तरीके से किया गया है इसमें सुदर्शन चक्र को समय का चक्र बताया गया है जो समय को भी बांध सकता था सुदर्शन चक्र से ही भगवान विष्णु ने माता सती के पार्थिव शरीर के 51 हिस्से किए थे महाभारत काल में भी श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से ही शिशुपाल का वध किया था महाभारत में जब अर्जुन जयद्रथ को सुरज ढलने से पहले मारने का वचन लिया था तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से सूरज को ढक लिया था लेकिन इसके बाद सुदर्शन चक्र का कोई वर्णन नहीं मिलता लेकिन 

     जब श्री कृष्ण ने देहत्याग किया तब चक्र का क्या हुआ इसका जवाब हमें भविष्यपुराण में मिलता है बताया गया है कि सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु के अवतार के सिवा कोई धारण नहीं कर सकता है और ना ही कोई चला सकता है जब श्री कृष्ण ने देहत्याग की तब वह भी पृथ्वी में समा गया और भविष्य में जब कल्कि अवतार धरती पर जन्म लेंगे तब वो चक्र को दोबारा पृथ्वीगर्भ से ग्रहण करेंगे कहा जाता है कि कलयुग के अंत के समय जब बुराई अपने चरम पर होगी और भगवान परशुराम और हनुमान जी कल्कि अवतार के साथ आएंगे और उन्हें प्रशिक्षण देंगे तब युद्ध में कल्कि अवतार सुदर्शन चक्र को धारण करेंगे और जिसका उपयोग करें बुराई का अंत कर देंगे पर ऋग्वेद का वर्णन देखे तो इसको समय का चक्र बताया गया है इस्तेमाल भगवान विष्णु करते हैं समय के अंतराल का उपयोग करके वह किसीभी विरोधी को शक्तिहीन कर देते हैं महाभारत में जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दिखाया था तब सुदर्शन चक्र के इस्तेमाल से ही उन्होंने समय को रोक दिया था तब रुके हुए समय में श्री कृष्ण ने अर्जुन को भागवत गीता का ज्ञान दिया था अगर हम ऋग्वेद से देखे तो सुदर्शन चक्र कोई भौतिक अस्त्र था ही नहीं जो कोई देखे और धारण कर सके यह सृष्टि के संचालक विष्णु के  गुण थे जो हमेशा उनके अवतार के साथ ही रहेंगे 

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