नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारुतः॥

     अर्थात आत्मा को ना तो कोई शस्त्र  विच्छेद सकता है ना अग्नि जला सकती है ना तो पानी भिगो सकता है और ना ही वायु सूखा सकती है आपने पाठ्यक्रम में भगवत गीता के श्लोक को पढ़ा दो है परंतु उस समय यह भावना केवल कंठस्त करके परीक्षा में उत्तीर्ण होने तक ही सीमित थी आयु बढ़ने के साथ जीवन को और भी निकट से देखा दुख सुख उत्साह है आदि जीवन का अभिन्न अंग है परंतु इन सब के मध्य जो एक प्रश्न मस्तिष्क में भ्रमण करता है वह है कि इस संसार को छोड़ने के पश्चात हमारा क्या होता है यह आत्मा कहां जाती है क्या इस संसार से परे भी कुछ है या आत्मा इसी दुनिया में भ्रमण करती है ऐसे अनेकों प्रश्नों से हम जूझते रहते हैं

     हम पुनर्जन्म रिवर्स या आफ्टर लाइफ से जुड़े कुछ तथ्य लेकर आए हैं पुराणों के अनुसार मृत्यु के पश्चात आत्मा शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करती है ध्यान देने की बात यह है कि दूसरा शरीर केवल मनुष्य नहीं बल्कि किसी भी प्राणी का हो सकता है आत्मा मृत्यु के पश्चात किस प्राणी का शरीर धारण करेंगी यह व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर करता है इस संदर्भ में पुराणों में कहा गया है कि मनुष्य को जीवन में जिस परिस्थिति का सामना करना पड़ता है मैं उसकी केवल इस जन्म बल्कि पिछले कई जन्मों के कर्मों का फल है कर्मों के अनुसार मनुष्य पशु या कीड़े मकोड़े किसी भी रूप में मिल सकता है इसलिए शरीर नश्वर है आत्मा नहीं यह भी उल्लेख है कि मृत्यु के समय हमारी जो चेतना होगी हमारा अगला जन्म उस पर ही निर्भर करेगा इसका कारण यह है कि मृत्यु अत्यंत भयावह है और उस समय मनुष्य उसी व्यक्ति वस्तु या इच्छा या भावना के विषय में सोचता है जिससे उसका जीवन भर या तो लगाव् होता है या पाने की इच्छा होती है इसके कारण अगला जन्म उसी भावना से संबंधित होता है

   इसे भरत महाराज के जीवन से समझा जा सकता है जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में भी है शकुंतला के पुत्र भरत महाराज के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा को जीवन के एक पड़ाव पर आकर वैराग्य हो गया और वह राजपाट त्याग एक जंगल में तपस्या करने चले गए एक दिन नदी के तट पर थे तभी एक गर्भवती हिरन पानी पीने के लिए पहुंची तभी एक शेर की दहाड़ सुनकर नदी को पार करने के प्रयास में कूद गई और इसी बीच उसने एक बच्चे को जन्म दिया जो नदी में ही गिर गया नदी के दूसरी बार जाकर हिरन ने अपने प्राण त्याग दिए भरत महाराज यह सब देख रहे थे एक बच्चा जिसने जन्म के समय ही अपनी मां को खो दिया उस पर भरत महाराज को दया गई और वह उसे अपनी कुटिया में ले गए उसका पालनपोषण जंगली जानवरों से बचाना अब उनका कर्तव्य बन गया था और देखते ही देखते उस हिरण के बच्चे से उन्हें प्रेम हो गया प्रतिदिन संध्या के समय उसके वापस आने की प्रतीक्षा करते थे उनके विचारों में कहीं ना कहीं हिरन निवास करता था मित्रों यह वही भरत महाराज थे जिन्होंने सन्यास ले लिया था कुछ समय पश्चात उनको मृत्यु का आभास हो गया था वे केवल यही सोचते थे कि उनकी मृत्यु के बाद उसका क्या होगा और अपनी अंतिम सांस तक उन्होंने यही विचार किया जिसका परिणाम यह हुआ कि उनका अगला जन्म हिरन के रूप में हुआ भरत महाराज भगवान के भक्त थे और ईश्वर की कृपा से उनको अपना पिछला जन्म स्मरण था अपने हिरण के जन्म में इसी कुटिया में पूरे जीवन जप तप और ध्यान करते रहे परिणाम स्वरूप अगले जन्म में पुनः मनुष्य शरीर जड़ भरत के रूप में प्राप्त किया और इस जन्म में ही उन्हें मोक्ष प्राप्ति हुई 

    पुराणों में यह भी उल्लेख है कि मोक्ष की प्राप्ति केवल मनुष्य जन्म के बाद ही संभव है भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है जो पुरुष अंतकाल में मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है इसलिए ही कहा जाता है कि जिसकी मृत्यु सुधर गई उसका जीवन सुधर गया तो मित्रों मनुष्य जीवन का उद्देश्य है मोक्ष प्राप्ति अर्थात भगवान को प्राप्त करना 8400000 योनियों के बाद सौभाग्य वर्ष हमें मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई है इसे व्यर्थ नहीं जाने देना है सदैव भगवान के नाम का जप करें उन से विनती करें और उन्हें स्मरण करें ताकि मृत्यु के समय केवल भगवान ही हमारे विचारों में हूं इसके पश्चात आपकी आत्मा किसी भी प्राणी का शरीर धारण नहीं करेगी अपितु सीधा अपने कर्त्तव्य स्थान पर ही पहुंचेगी