आप सभी ने पढ़ा होगा यहां तक कि सुना भी होगा लेकिन हम बात कर रहे हैं महाभारत के उस क्षण कि जब महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्ण को बचानी पड़ी थी कर्ण की जान अगर वह कर्ण की जान नहीं बचाते तो स्वयं हनुमान जी कर्ण का सर्वनाश कर देते महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर बैठे हनुमान जी कभी-कभी खड़े होकर कौरवों की सेना की ओर घूर कर देखते थे तो उस समय कौरवों की सेना तूफान की गति से युद्ध भूमि को छोड़कर भाग जाती थी हनुमान जी की दृष्टि का सामना करने का साहस किसी में नहीं था

यहां तक कि उनकी दृष्टि एक बार कौरव की ओर से लड़ रहे करण पर पड़ी वह तो भगवान श्री कृष्ण ने कर्ण को बचा लिया वरना वह कब के हनुमान जी की दृष्टि से ही खत्म हो जाते हैं चलिए आपको बताते हैं यह खास पूरा किस्सा इस प्प्रसंग में यह बताएं गया था जब करण और अर्जुन के बीच में युद्ध चल रहा था तो करण अर्जुन पर भयंकर बाणों की वर्षा कर रहे थे

उनके बाणों की वर्षा से श्री कृष्ण को बाण लग रहे थे उनके बाण से श्रीकृष्ण कवच टूट गया और उनके बाण भगवान श्री कृष्ण के हाथ पर घाव बना दिया रक्त की बून्द देख छत पर बैठे पवन पुत्र हनुमान जी नीचे अपने आराध्य की और ही देख रहे थे

श्रीकृष्ण कवच हिन् हो गए और कर्ण के बाण उनके अंगों को भेद रहे थे हनुमान जी से यह सहन नहीं हुआ और उसी समय वह गर्जना कर कर दोनों हाथ उठाकर करण को मार देने के लिए उठ खड़े हुए उस समय हनुमान जी की भयंकर गर्जना से ऐसा लगा मानो ब्रह्मांड फट गया हो कौरव सेना तो पहले ही भाग चुकी थी

अब पांडव पक्ष की सेना भी भागने लगी साक्षात हनुमान जी का क्रोध का कारण कर्ण के हाथ से धनुष छूटकर गिर गया उन्हें भी लगने लगा कि अब उनका अंतिम समय आ चुका है भगवान श्री कृष्ण ने तत्काल उठे और हनुमान जी को स्पष्ट सावधान किया और अभी ये करने का समय नहीं है श्री कृष्ण कृपा से हनुमानजी रुक गए

लेकिन उनकी पूंछ खड़ी होकर आकाश में हिल रही थी उनके दोनों हाथों की मुट्ठी बंद थी उनकी आंखें ऐसी लग रही थी मानो उसमे आग भारी हो वैसे होना लाजमी था हनुमान जी भगवान राम के भक्त हैं और स्वयं राम ही भगवान विष्णु थे और विष्णु का अवतार थे भगवान श्रीकृष्ण ऐसे में अपने आराध्य देव को परेशान देखकर हनुमान जी का क्रोध बढ़ने लगा हनुमान जी का क्रोध देख कर्णऔर उनके साथी  कांपने लगे

हनुमान जी का क्रोध शांत ना होते देखा है कृष्ण ने कड़े स्वर में हनुमान जी से कहा मेरी और देखो अगर तुम इस प्रकार करण की और कुछ क्षण देखोगे तो करण तुम्हारी दृष्टि से ही मर जाएगा यह त्रेता युग नहीं है तुम्हारे पराक्रम और तुम्हारी शक्ति को तो दूर तुम्हारे तेज को भी कोई यहां सहन नहीं कर सकता

तुमको मैंने इस युद्ध में शांत रहकर बैठने को कहा है यह सब सुनकर हनुमानजी ने अपने आराध्य देव की ओर देखा और शांत होकर बैठ गए लेकिन यह क्षण इतना भयंकर था कि उसने कर्ण को पूरी तरह से हिला कर रख दिया क्योंकि उन्हें यह भी लगा कि अब तो मौत निश्चित है हनुमान जी किसी और का नहीं बल्कि भगवान शंकर का अवतार है ऐसे में शंकर अवतार का गुस्सा होना यह दर्शाता है कोई और नहीं देवों के देव महादेव रूठ गए हैं