आप जानते ही होंगे कि भारत में सैकड़ों चमत्कारिक और रहस्यमई मंदिर हैं उन्हें देखा भी होगा तो चलिए आज हम भी आपको एक रहस्यमई चमत्कारिक मंदिर के विषय में बताते हैं जिसके बारे में जानकर आपको आश्चर्य होगा आज हम आपको लिए चलते हैं भारत के हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में जहां माता सती की जीभ गिरी थी

इसे ज्वाला जी के नाम से जाना जाता है यह माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है ना घी ना तेल फिर भी हजारों सालो से ये ज्वाला जल रही है न आग न धुआँ फिर भी कैसे हजारो सालो से उबाल रहा हे ये पानी मन्दिर में माता की कोई प्रतिमा नहीं है बल्कि ये ज्वाला की ही पूजा की जाती हे जो हजारो साल से प्रज्वलित हे इस स्थान में आदि काल से ही पृथ्वी के अंदर से नो अग्नि की ज्वाला ए निकल रही है

ये ज्वाला नौ देवियों महाकाली महालक्ष्मी सरस्वती अन्नपूर्णा चंडी विंध्यवासिनी हिंगलाज भवानी अंबिका और अंजना देवी का ही स्वरूप है लगभग 200 वर्षों से वैज्ञानिक भी इन्हीं ज्वाला के रहस्य से अनजान हे  वैज्ञानिकों ने कई बार यहां आकर ज्वाला का ईंधन खोजने का प्रयास किया हे  परंतु हर प्रयास निष्फल हुआ और हार मानकर अपनी रिसर्च रोक दी 

ज्वाला देवी के विषय में एक प्राचीन कथा है कि माता का भक्त ध्यानु हर वर्ष यहां की यात्रा करता था एक बार अकबर ने उसे वहां जाने से रोक दिया और ध्यानू के घोड़े का सिर यह कहकर काट दिया कि यदि तुम्हारी माता सच्ची होंगी तो घोड़े को पुनः जीवित कर देंगे ऐसे में ध्यानु ने कहा कि है महाराज आप मेरे घोड़े के सर और धड़ को एक माह तक सुरक्षित रखने का प्रबंध कर दें अकबर ने ध्यानू की बात मान ली

फिर ध्यानु माता के दरबार पहुंचकर स्नान पूजन और रात भर जागरण किया सुबह माता से हाथ जोड़कर बोला कि हे माता अब मेरी लाज आपके ही हाथों में हे कहते हैं कि अपने भक्तों की लाज रखते हुए माता ने घोड़े को पुनः जीवित कर दिया गया और यह देखकर अकबर हैरान रह गया उसने माता की परीक्षा लेने की नीयत से सेना बुलाई और खुद मंदिर पहोच गया और वह क्षेत्र को क्षति पोहचने का प्रयास किया

सबसे पहले उसेने मंदिर में पानी डलवाया लेकिन माता की ज्योति नहीं बुजी फिर उसने नहर खुद कर पानी की धारा को ज्वाला की ओर मोड़ दिया लेकिन ज्वाला फिर भी नहीं बुजी ऐसे ही कई प्रयासों के बाद वह हार मान गया और उसे यकीन हो गया यहां पर जरूर कोई शक्ति विराजमान है तब उसने सोने का छत्र चढ़ाया जिसे माता ने अस्वीकार कर दिया और वह जमीन पर गिरकर एक ऐसी धातु में परिवर्तित हो गया जिसका पता आज तक वैज्ञानिक भी नहीं लगा पाए वो आज भी मौजूद है जिसे आप वहां जाकर देख सकते हैं

स्कंदपुराण अनुसार सतयुग में दैत्यराज पुलों की पुत्री ने इंद्र को पति रूप में प्राप्त करने के लिए ज्वाला धाम में हिमालय की अधिष्ठात्री देवी पार्वती की तपस्या की थी माता पार्वती ने तपस्या पर प्रसन्न होकर उसे दिवाली के रूप में दर्शन दिए और की मनोकामना पूर्ण की थी कहते हैं कि सतयुग में महाकाली के परम भक्त राजा भूमि चंद ने स्वप्न से प्रेरित होकर यह भव्य मंदिर बनवाया था

बाद में इस स्थान की खोज पांडवों ने की थी इसके बाद यहां पर गुरु गोरखनाथ ने घोर तपस्या करके माता से वरदान और आशीर्वाद प्राप्त किया था 1835 में इस मंदिर का पुनः निर्माण राजा रणजीत सिंह और राजा संसार चंद ने करवाया था जो भी सच्चे मन से इस रहस्यमई मंदिर के दर्शन के लिए आता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है 

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