आपका स्वागत है महाभारत की कुछ इंटरेस्टिंग स्टोरीज में आज मैं आपको महाभारत के मुख्य पात्र अर्जुन के धनुष के बारे में बताऊंगा दुर्योधन ने जब अपने योद्धा से पूछा कि आप लोग कितने दिनों में पांडवों की सेना को खत्म कर सकते हो तो भीष्म और द्रोण ने जवाब दिया कि 1 महीने में कृपाचार्य ने कहा कि 2 महीने में अश्वत्थामा ने जवाब दिया सिर्फ 10 दिन में और कर्ण ने जवाब दिया 4 दिनों में

आपका यह जानना भी आवश्यक है कि पांडवों के सर्वश्रेष्ठ योद्धा और प्रभु श्री कृष्ण के मित्र अर्जुन को गंभीर तपस्या के बाद महादेव ने उनको प्रचंड अस्त्र मिला था जिसका नाम था पशुपात अस्त्र जो एक पल मे दुनिया को खत्म कर देने में सक्षम था महादेव खुद कहते हैं पशुपात अस्त्र  का ज्ञान कौरवो तो क्या खुद इंद्रा यम यक्ष वरुण और वायुदेव को भी नहीं है

इस अस्त्र को पकड़ने की छोड़ने की प्रतिहार करने का ज्ञान सिर्फ महादेव ने अर्जुन को ही दिया इस अस्त्र से  तीनों लोक में से किसी का भी वध  किया जा सकता है इसका प्रयोग किसी दुर्बल पर नहीं किया जाता

जब युधिष्ठिर ने अर्जुन से पूछा कि कौरव का सहार तुम कितने दिनों में कर सकते हो इस पर अर्जुन ने कहा कि जब श्री कृष्ण मेरे साथ रथ में  बैठे हैं मैं चाहूं तो तीनों लोकों में एक ही क्षण में प्रलय ला सकता हूं भूत वर्तमान और भविष्य का विनाश कर सकता हूं महादेव के साथ हुए द्वंद के पश्चात उन्होंने मुझे पशुपतास्त्र दिया है

जिसका उपयोग महादेव युग के अंत में विधविश करने के लिए करते हैं इसका ज्ञान मेरे अतिरिक्त भीष्म द्रोण और ना ही ना ही अश्वत्थामा और ना ही करण के पास है अब तो आपको पता चल गया होगा कि 1 दिन की भी नहीं बल्कि एक ही पल में अर्जुन महाभारत का युद्ध खत्म कर सकते थे पर उन्होंने पशुपतास्त्र के संपूर्ण शक्ति इस्तेमाल करने की बजाय अपनी विद्या का इस्तेमाल किया था

और अपने से कमजोर किसी भी महाबली पर महाशक्तिशाली अस्त्रों का प्रयोग नहीं किया था और इन्हीं बातों के कारण महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाये महदेव ने ये अस्त्र अर्जुन को क्यों दिया जब पांडव द्रौपदी सहित वन में अज्ञातवास का समय बिता रहे थे तब तमाम कष्टों को देखते हुए श्री कृष्ण और महर्षि व्यास जी ने अर्जुन से भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनसे वरदान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया भगवान शिवजी को प्रसन्न करने का उन्होंने उपाय भी अर्जुन को बताया व्यास जी के निर्देशानुसार अर्जुन इंद्रकील पर्वत पर पहुंच गए उन्होंने शिवलिंग का निर्माण कराया और उसी शिवलिंग की पूजा अर्चना करने लगे और तपस्या करने लगे

जब शिवजी को अर्जुन की कठोर तपस्या का आभास हुआ तो उन्होंने अर्जुन की परीक्षा लेनी चाहिए वह 1 दिन भील यानि शिकारी का रूप धारण कर वहा पोहचे तभी दुर्योधन का भेजा राक्षस सूअर रूप धारण करके वृक्ष को पर्वतो को नुकसान पहुंचा वहां पहुंचा यह देख अर्जुन को समझने में देर नहीं लगी यह मेरा नुकशान करना चाहता हे और तुरंत धनुष और बाण उठा लिया उसी समय शिवजी अपने गुणों सहित भील का रूप धारण कर वहां पहुंच गए

उसी के पल सूअर ने आक्रमण करने के लिए एक कदम आगे बढ़ाया तभी भीलराज और अर्जुन ने एक साथ बाण छोड़ा वह सूअर कर तत्काल ही मर गया जब वह दोनों अपना तीर उठाने गए तो अर्जुन और भील रूप धारण किए शिवजी के सेवक के सूअर को किसने मारा इस पर बहस हो गई अर्जुन को गुस्सा आ गया वह बोले मैं तुमसे नहीं तुम्हारे राजा से युद्ध करूंगा 

यह बात जो भगवान शिव ने सुनी तो मैं अपने गुणों सहित युद्ध के लिए तैयार हो गए दोनों में घमासान युद्ध हुआ अर्जुन के बाणों से घायल होकर शिवगंज चारों ओर घूमने लगे फिर किरात वेषधारी शिवजी के बाण और कवच को नष्ट कर दिया तब अर्जुन ने भगवान शिव का ध्यान किया तभी शिव रूप से अपने असली रूप में प्रकट हुए और अपने सामने शिवजी को पाकर भावुक हो गए 

शिव जी को प्रणाम करने लगे तब शिवजी बोले प्रसन्न हूं मांगो क्या वर मांगते हो अर्जुन ने कहा नाथ मेरे ऊपर शत्रु का जो संकट मंडरा रहा है वह तो आपके दर्शन मात्र से ही दूर हो जाएगा जिससे मेरे लोगों की प्रसिद्धि हो ऐसी कृपा करें शिवजी मुस्कुराए और अपने अजय पशुपाल अस्त्र देते हुए कहा तुम सदा अजय रहोगे जाओ विजय को प्राप्त करें और फिर भगवान शिव वहां से चले गए होते हुए अपने भाइयों के पास लौट गए और उसके बाद का तो आपको पता ही है कि महाभारत के युद्ध में क्या हुआ 

 

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