समुद्र मंथन के बाद भगवान विष्णु का वराह अवतार हुआ था दोस्तों कई सारे लोग भगवान विष्णु के दशावतार को एक काल्पनिक कहानी समझ कर देखते हैं दरअसल वे इसलिए ऐसा समझते हैं क्योंकि अंग्रेजो ने हमारे धर्म ग्रंथों को नीचा दिखाने के लिए हमारे ग्रंथों में बहुत से छेड़छाड़ किए हैं

आज भगवान विष्णु ने इतने सारे जीव होने के बावजूद सूअर का अवतार ही क्यों चुने और वह राक्षस हमारी पृथ्वी को अंतरिक्ष के किस डायमेंशन में छुपाया था और क्यों आज हमारी पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट के मूवमेंट को भगवान विष्णु के वराह अवतार से जोड़कर देखा जा रहा है तो दोस्तों इस पूरी घटना को लॉजिकली विद साइंटिफिक तरीके से अमल करने की कोशिश करूंगा

समुद्र मंथन के कुछ वर्षों बाद एक दिन ब्रह्मा जी के चार पुत्र सनक नंदन सनातन और संत कुमार विष्णु जी से मिलने वैकुंठ लोक पोहचे वेईकुंड के द्वार पर द्वारपाल मौजूद थे इन्हीं का नाम जय विजय था आप सब ने इन्हें विष्णु मंदिर के द्वार पर देखे ही होंगे ब्रह्मा जी के चार पुत्र छोटेछोटे बच्चों के समान दिखते हैं लेकिन वे केवल बच्चे ही नहीं बल्कि बहुत बड़े ज्ञानी भी हैं और वे पूरे ब्रह्मांड में भ्रमण करते रहते हैं विष्णु जी से मिलने आए इन चार बालकों को जय विजय ने द्वार पर ही रोक दिया और इन बालों को के अवतार को देखकर हंसने लगे जिसके बाद ब्रह्म पुत्रों ने जय विजय को सात जन्मो तक मृत्यु लोक पर भगवान विष्णु से दूर रहकर जीवन व्यतीत करने का श्राप दे दिया

तब जय विजय ने भगवान विष्णु के पास पहुंचकर इस श्राप के बारे में बताएं और कहे कि हम सही तरीके से अपना ड्यूटी कर रहे थे लेकिन फिर भी हमें यह श्राप मिला है अब आप ही हमें इस श्राप से मुक्त कर सकते हैं तब विष्णु जी ने कहा मैं इस श्राप से तुम्हें मुफ्त तो नहीं कर सकता लेकिन मैं एक विकल्प दे सकता हूं कि मुझसे दूर सात जन्मो तक पृथ्वी लोक पर जीना स्वीकार करोगे या फिर 3 जन्मों तक मेरा शत्रु बनकर तो इस पर जय विजय ने सोचा कि सात जन्मों से तो बेहतर जनम है और फिर वह तीन जन्मों तक भगवान विष्णु के शत्रु बनकर दूर रहना स्वीकार किए और दोस्तों यही से भगवान विष्णु का दशावतार की कहानी शुरू होती है

और यह जय विजय का पहला जनम हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का था दूसरा जन्म रावण और कुंभकरण का और तीसरा जन्म शिशुपाल और दंत वक्र का तो दोस्तों यह तो हो गई वैकुंठ लोक की बात और चलते हैं हमारी पृथ्वी पर यहां पर कश्यप मुनि नामक एक मुनि रहा करते थे जिनकी दिति और अदिति नामक दो पत्नियां थी जब दीती गर्भवती हुई तब दीती ने गर्भ में पल रहे उन बालकों का भविष्य देखने की इच्छा जताई कश्यप मुनि बहुत बड़े ज्ञानी थे और वे गर्भ में पल रहे उन लोगों का भविष्य देख कर खुद कांप उठे और दीती से कहा तुम्हारी गर्व से 2 पुत्र जन्म लेंगे और इन्हीं के कारण महाविनाश होगा और वह बहुत बड़े राक्षस बनेंगे

तो हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के जन्म लेते ही पूरा स्वर्ग लोक का पोथा कश्यप मुनि की पत्नी अदिति काफी शुभ गुणों वाली थी लेकिन दिति घमंड और जलन की स्त्री थी और हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु को बचपन से ही देवताओं के प्रति हराने की और स्वर्ग को अपने अधीन में करने की बातें सुनाया करती थी और इसी सोच के कारण जब भी बड़े हो गए अब अपनी इच्छा को पूर्ण करने के लिए हिरण्याक्ष ने घोर तप करके ब्रह्म देव को प्रसन्न कर वरदान में अमर होने की इच्छा प्रकट की लेकिन ब्रह्मदेव अमरता का वरदान के बदले दूसरा वरदान मांगने को कहा तब हिरण्याक्ष ने सभी देवताओं के नाम के साथ कुछ समय के सभी जीवजंतुओं का नाम लेकर कहा कि इनमें से किसी भी जीव के हाथों उसकी मृत्यु ना होने का वरदान मांगा जिसके बाद ब्रह्मदेव ने उसे यह वरदान दे दिए और फिर कुछ क्षणों बाद हिरण्याक्ष में पूरी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया और सभी देवताओं को युद्ध में हराया गया

और तभी एक दिन नारद मुनि से भेंट कर खुद की प्रशंसा करने लगा और कहने लगा कि इस ब्रम्हांड में कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता तो इस पर नारद मुनि ने कहा कि बस एक श्री महाविष्णु है जिनसे तुम जीत नहीं पाओगे अब हिरण्याक्ष भगवान विष्णु से युद्ध करके पूरे ब्रह्मांड को अपने अधीन में कर लेना चाहता था तो इसके लिए उसने एक तरकीब निकाली हो तो वह तो वैकुण्ठ लोग जा नहीं सकता लेकिन भगवान विष्णु को स्वयं बुलाने के लिए उसने पृथ्वी को पाताल लोक के डायमेंशन में मौजूद गर्भो दर्शन में छिपा दिया जिसके बाद पूरे ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ने लगा और तभी भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए एक नए स्पीशीज का निर्माण किए जिसका शरीर हमारी पृथ्वी के मुताबिक 100 गुना बड़ा था और यही नया स्पीशीज भगवान विष्णु का वराह अवतार कहलाया

तो दोस्तों यहां पर प्रश्न आता है कि भगवान विष्णु ने इतने सारे स्पीशीज होने के बावजूद सूअर का अवतार ही क्यों तूने ऐसा इसलिए क्योंकि पहली बात तो पृथ्वी को उस गर्भोदर्शन से निकालने के लिए सूअर के अलावा दूसरा जीव्  उस वातावरण में जी नहीं सकता और दूसरा रीजन यह था कि इसी अवतार के द्वारा हिरण्याक्ष का वध हो सकता था क्योंकि जब हिरण्याक्ष में ब्रह्मदेव से वरदान मांगा था तो उस समय इस प्रकार का स्पीशीश इस पूरे ब्रह्मांड में कहीं नहीं मौजूद था इसीलिए वराह देव को आदि वराह भी कहा जाता है आदि का मतलब है पहला दोस्तों यहां पर मैं आपको एक इंटरेस्टिंग फैक्ट बताता हूं सूअर का डीएनए और इंसान का डीएनए ९९ प्रतिशत मिलता होता है बस एक प्रतिशत के फर्क से वह सूअर कहलाते हैं और हम इंसान और दोस्तों इसीलिए मेडिकल साइंस में किसी भी एंटीडोज़ बनाने से पहले उसका टेस्ट सूअर पर ही किया जाता है

तो दोस्तों वराह देव ने पृथ्वी को अपने दंत पर उठाकर पुनः पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दिए दोस्तों यहां पर मैं आपको एक और साइंटिफिक फैक्ट बताता हूं हमारे पुराणों के हिसाब से उस समय के नक्षत्र यानी स्टार साइंस के अनुसार वराह देव द्वारा पृथ्वी को अपनी कक्षा में स्थापित करने का समय और हमारी पृथ्वी पर टेक्टोनिक प्लेट्स की हलचल से 7 कॉन्टिनेंट का निर्माण होने का समय काफी हद तक मिलता हे यह दोनों समय की गणना मेल खाती है और दोस्तों यही वह समय था जब एनिमल्स में काफी ज्यादा एवोल्यूशन हुआ था तो दोस्तों उसके बाद हिरण्याक्ष और वराह देव के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया श्रीमद् भागवत के अनुसार यह युद्ध काफी लंबे समय तक चला था जिसे सही से अनुवाद करें तो आपको किसी एक्शन फाइट सीन का याद दिला देगा क्योंकि हिरण्याक्ष कोई साधारण देते नहीं था और फिर अंत में वराह देव ने हिरण्याक्ष का अंत कर दिया