ऐतहासिक घटनाओं की सच्चाई पर विश्वास रखना आज के समय में थोड़ा मुश्किल है क्योंकि मौखिक रूप से आगे बढ़े इतिहास में कई फेरबदल हो जाते हैं ठीक ऐसा ही कुछ रानी लक्ष्मी बाई के बारे में भी हुआ है उनके और उनके लड़ियों के बारे में कई इतिहासकार अलगअलग दावे करते हैं अब इस तस्वीर को ही ले लीजिए कुछ दिनों पहले यह तस्वीर वायरल हुई थी

क्योंकि इस तस्वीर को लेकर यह दावा किया जा रहा था कि यह तस्वीर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की है लेकिन बाद में यह बात साफ हो गई यह तस्वीर उनकी नहीं है क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई का इस तरह फोटो खिंचवाने का जिक्र कहीं नहीं मिलता और ना ही जिन अंग्रेजों ने उनको देखकर उनका वर्णन किया है उस वर्णन से यह तस्वीर मेल खाती है बहुत कम ऐसे ब्रिटिश लोग हैं जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई को साक्षात देखा था और उनके बारे में किताबों में लिख कर रखा था 

इन्हीं किताबों में से कुछ किताबें ऐसी है जिनमें उनका वर्णन और उनकी आखिरी लड़ाई के बारे में सही से जानकारी उपलब्ध है जॉन लिंग वह शख्स थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया था जब रानी लक्ष्मीबाई ने दामोदर को गोद लिया और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो अंग्रेजों ने उनका कड़ा विरोध किया और इसे अवैध बताया 

 

जिसके बाद उन्हें अपनी हवेली छोड़कर साधारण महल में शरण लेनी पड़ी थी अंग्रेजो के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई की तरफ से जामलिंग नाम के वकील लड़ रहे थे जिनका जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और जिन्होंने इससे पहले ब्रिटिश ओं के खिलाफ कई केस दाखिल करके उन्हें जीता भी था और यही वह शख्स थे जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आंखों से उनकी हवेली में देखा था और उनका वर्णन भी लिख कर रखा था ऐसा पहला और आखरी अधिकारी था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आंखों से लड़ाई के मैदान पर लड़ते देखा था 

उसने लिखा है की रानी लक्ष्मीबाई घोड़े पर सवार थी और अपने दोनों हाथों में तलवार पकड़े ब्रिटिश का सामना कर रही थी और घोड़े पर काबू पाने के लिए उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दांतों में रखी थी आगे लिखते हैं कि उसने आगे जाकर रानी पर हमला करने की कोशिश की लेकिन रानी के गुरु ने उसे आगे नहीं बढ़ने दिया थोड़ी देर में पीछे से अंग्रेजों की 1 फुट की टुकड़ी ने हल्ला बोल दिया जो टुकड़ी अंग्रेज हमेशा छुपे रखते थे और जब मैदान में हार के करीब होते तो उस टुकड़ी को बाहर निकाला जाता यह देखकर रानी ने एक साहसी निर्णय लिया और अंग्रेजों का ध्यान भटकाने के लिए 15 से 20 जवानों के साथ जंगल की ओर निकल पड़ी 

टुकड़ी भी रानी का पीछा करने लगे और करीब 1 मील तक पीछा करने के बाद उन्होंने रानी पर हमला बोल दिया जहा रानी के एक सिपाही के मुकाबले तीन तीन अंग्रेजों का मुकाबला शुरू हुआ तभी एक अंग्रेज ने जिसे रानी देख नहीं पाई उसने रानी के सीने में संगीन से वार किया वार गहरा नहीं था लेकिन खून बहने लगा था रानी ने फौरन पीछे पलटकर उस अंग्रेज पर जवाबी हमला किया रानी आगे बढ़ी अंग्रेज अभी भी उनके पीछे थे 

उनके रास्ते में एक झरना आया रानी ने सोचा कि इस झरने को पार करने पर कोई भी उनका पीछा नहीं कर सकेगा यह सोचकर रानी ने झरने से छलांग लगाने की कोशिश की लेकिन झरने के पास आकर ही घोड़ा रुक गया और आगे नहीं बढ़ा और तभी पीछे से आए एक अंग्रेज ने रानी को गोली मारी और रानी के हाथों से तलवार गिर पड़ी तब तक पीछे से एक और अंग्रेज अधिकारी रानी के पास पहुंच गया और उसने रानी के सिर पर जोरदार वार किया रानी ने भी उसका वार रोकने की और पलटवार करने की कोशिश की लेकिन वह चूक गई और उनके सिर पर काफी गहरी चोट आई और वह जमीन पर गिर पड़ी

वह अंग्रेज रानी पर और वार करता उतने में रानी के एक सैनिक ने उस सिपाही को रास्ते से हटा दिया और रानी को उठाकर पास के एक मंदिर में ले गया तब तक रानी जीवित थी सिर पर लगी चोट की वजह से उनकी एक आंख बंद थी उन्होंने मुश्किल से दूसरी आंख खोलकर कहा कि जाओ दामोदर को छावनी ले जाओ और मेरा शरीर अंग्रेजों के हाथ नहीं लगना चाहिए और थोड़ी देर बाद उन्होंने एक लंबी सांस भरी और उन्हें वीरगति प्राप्त हुई उस सैनिक ने रानी की इच्छा अनुसार उनके पार्थिव शरीर को मंदिर से थोड़ी ही दूर ले जाकर अग्नि दी और जब ब्रिटिश अधिकारी वहां पहुंचे तो उन्हें सिर्फ रानी की अस्थियां ही मिली 7 दिन तक रानी ने अपनी सेना के साथ अंग्रेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया और वीरता और बलिदान की मिसाल कायम की 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *