आज वो जानकारी दूंगा जो सवाल  शायद हर व्यक्ति के मन में आया होगा जिसने महाभारत देखी या सुनी है वह सवाल है कि क्या कौरव आज भी जिंदा है महाभारत के युद्ध में यह पहले से ही निश्चित था कि अधर्मी यों का नाश होगा उस समय अधर्मी कौरव थे जैसा कि हमें पता है कि महाभारत युद्ध में 100 के 100 कौरव भाई मारे गए थे उनमें से एक कौरव भाई ऐसा भी था जो कौरव होने के बावजूद भी कौरव नहीं कह लाए और अंत में ना ही मरे आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि वह भाई कौन थे तो मैं आपको बता दूं वह थैं युयुत्सु जो की महाभारत के युद्ध के अंत में बचे गए योद्धाओं में से एक थे

उन के पिता धृतराष्ट्र ही थे किंतु उनकी माता गांधारी नहीं बल्कि उनकी दासी थी जिसका नाम सुघड़ा था जब युयुत्सु  का जन्म हुआ तो वह देखने में अत्यंत बलवान लगते थे और इसी कारण उनका नाम युयुत्सु रखा गया जिसका मतलब होता है एक योद्धा वह दुर्योधन से छोटे और दुशासन से बड़े थे महात्मा विदुर की ही भांति उसने भी जीवन भर राजपूत्र होने के बावजूद भी दास पुत्र होने का दंश झेला था फिर कि उसका महत्व हस्तिनापुर में बहुत था महाभारत के युद्ध के बाद धूतरास्त्र और गांधारी की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार युयुत्सु ने  किया था 

ऐसा भी कहा जा सकता है कि बचपन में उसने युधिष्ठिर को सूचित किया था कि दुर्योधन ने भीम के भोजन में जहर मिला दिया है भवन में भी उसने भी करण के साथ ही चीर हरण का पूरा जोर विरोध किया था किंतु दोनों की बात किसी ने नहीं सुनी थी वह एक उत्कृष्ट योद्धा था और उसकी गिनती विशेष योद्धा में की जाती है

जब महाभारत का युद्ध हुआ तो ना चाहते हुए भी उसे कौरव के पक्ष में ही युद्ध लड़ना पड़ा लेकिन युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले ही वह कौरव पक्ष छोड़कर पांडवों के पक्ष में चला गया युधिष्ठिर जानते थे कि इस युद्ध में धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों की मृत्यु हो जाएगी इसलिए उनको कभी भी सीधे युद्ध में भाग लेने के अनु मति नहीं दी 

उन्होंने युयुत्सु को पांडव सेना के लिए अस्त्र और रसोई पूर्ति करने के कठिन जिम्मेदारी सौंपी जिसे उसने बखूबी निभाया महाभारत में उसके और शकुनि पुत्र उल्लू के युद्ध का भी वर्णन मिलता है जहां उसे उल्लू द्वारा अति आहात कर देने के कारण युद्ध क्षेत्र से पीछे हटना पड़ता है

महाभारत युद्ध के पश्चात् जब कौरवो की पत्नियां विलाप कर रही थी और भीम के भय से राज महल में से  सभी भ्रष्ट हो रहे थे तब उन्हें युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की आज्ञा लेकर स्वयं हस्तिनापुर राज महल में प्रवेश किया और सभी राज्यवासी  को हौसला प्रदान किया फिर वह महात्मा विदुर से मिले और फिर उनकी आज्ञा से कई दिनों तक धुतराष्ट्र और गांधारी के साथ रहे जिससे उन्हें बहुत हौसला मिला धृतराष्ट्र और गांधारी की मृत्यु के पश्चात युयुत्सु ने ही पुत्र धर्म निभाते हुए उनका अंतिम संस्कार किया जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर के सम्राट बन गए तो उन्होंने युयुत्सु को अपना मंत्री बनाया

काफी वर्ष राज करने के बाद जब युधिष्ठिर और अन्य पांडव द्रोपदी के साथ स्वर्गारोहण पर चले गए तो उन्होंने अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को हस्तिनापुर का सम्राट घोषित किया और युयुत्सु को ही उसका सरंक्षण बनाया हरियाणा और उत्तरी भारत के जाट समुदाय को युयुत्सु का ही वंश माना जाता है तो दोस्तों अब आपको अपने सवाल का जवाब मिल गया होगा कि आज भी जिंदा है कि नहीं 

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