जब महाभारत का जिक्र किया जाता है एक ऐसे शूरवीर योद्धा की जिक्र भी आपको सुनने और कहानी उसके बारे में जानने को मिलेगी जिसने भले ही कौरवों का साथ दिया लेकिन वह इतना शक्तिशाली और इतना महान था कि उसके पराक्रम के किस्से आज भी हर युवा के दिल में रहते हैं आज हम उसी महाभारत के योद्धा के कुछ खास रहस्य आपको बताएंगे 

आज हम जिस खास महान महाभारत के योद्धा की बात कर रहे हैं वह कोई और नहीं बल्कि सूर्यपुत्र कुंती पुत्र कर्ण है जी हां कर्ण दुर्वासा ऋषि के वरदान से कुंती ने सूर्य का आह्वान कर के कौमार्य में ही करण को जन्म दिया था और लोक लाज के भय से कुंती ने उसे नदी में बहा दिया बाद में गंगा किनारे हस्तिनापुर के सारथी अधिरथ को कर्ण  मिला और उस बालक को वह अपने घर ले गया करण को अधिरथ की पत्नी राधा ने पाला इसीलिए करण को राधे भी कहा जाता है 

अंग देश के राजा कर्ण की पहली पत्नी का नाम वृषाली था और विशाली से उसको वृशकेतु नामक तीन पुत्र प्राप्त हुए थे हालांकि यह कथा मान्यता पर आधारित है कहते हैं कि द्रौपदी को महारथी कर्ण से प्रेम था और कर्ण को भी द्रौपदी से प्रेम था स्वयंवर में कर्ण भी गए थे राजा द्रुपद का भीष्म से विरोध था और कर्ण भीष्म के पक्ष में थे राजा द्रुपद ने द्रौपदी को पहले ही बता दिया कि कर्ण एक सूत पुत्र है यदि तुमने उन्हें पसंद किया तो जीवन भर तुम्हें एक डास की पत्नी के रूप में पहचाना जाएगा स्वयंवर में द्रौपदी ने कठिन निर्णय लिया और अर्जुन को ही चुना 

दुर्योधन की पत्नी का नाम था भानुमति कहते हैं कि भानुमती का कर्ण के साथ अच्छा संबंध हो चल गया था दोनों एक दूसरे के साथ मित्र रहते थे कर्णऔर दुर्योधन की पत्नी भानुमति एक बार शतरंज खेल रहे थे इस खेल में कर्ण जीत रहा था तभी भानुमति ने दुर्योधन को आते देखा और खड़े होने की कोशिश की थी दुर्योधन के आने के बारे में कर्ण को पता नहीं था इसीलिए जैसे ही भानुमति ने उठने की कोशिश की कर्ण ने पकड़कर बिठाना चाहा और यह सब दुर्योधन ने देख लिया लेकिन पर कर्ण पर विश्वास था इसीलिए उसने कुछ नहीं कहा 

तीसरा रहस्य है कि एक बार कुंती कर्ण के पास गई और उससे पांडव की ओर से लड़ने का आग्रह किया कर्ण को मालूम था कि कुंती उनकी माता है कुंती के लाख समझाने के बावजूद भी कर्ण नहीं माने और कहा जिनके साथ मैंने अब  तक अपना सारा जीवन बिताया उसके साथ में विश्वासघात नहीं करूंगा कुंती ने कहा कि क्या तुम अपने भाइयों को मारोगे तब कर्ण ने बड़ी ही दुविधा की स्थिति में एक वचन दे दिया कहा माते तुम जानती हो कि कर्ण के यहां याचक बनकर आया कोई भी खाली हाथ नहीं जाता मैं तुम्हें वचन देता हूं कि अर्जुन को छोड़कर अन्य सभी भाइयों पर कोई अस्त्र शस्त्र नहीं उठाऊंगा ना ही उनका वध करूंगा 

तो आप यह तो जानते होंगे कि कर्ण को कवच और कुंडल धारण थे कहते हैं कि वहां पर सुदर्शन चक्र हो या भगवान शिव का त्रिशूल या फिर इंद्र का वज्र वह भी उस कवच कुंडल का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे क्योंकि वह स्वयं कवच कुंडल सूर्य और से खास तौर पर आशीर्वाद के रूप मिला था सूर्य को यह भगवान शिव द्वारा मिला हुआ था 

 

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