आज हम आपको बताएंगे कि मीराबाई की मौत कैसे हुई थी कृष्ण भक्त मीरा बाई की मौत एक रहस्य है उनकी मृत्यु का कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं मिलता और इसके बारे में अलग-अलग विद्वानों की अलग-अलग राय है मीराबाई की मृत्यु स्थान के बारे में अधिकतर मत द्वारका से जुड़े हुए हैं

आइए जानते हैं मीराबाई के बारे में राजस्थान के मेड़ता में मीराबाई का जन्म हुआ था उनके पिता मेड़ता के राजा थे कहते हैं जब मीराबाई बहुत छोटी थी तो उनकी मां ने श्रीकृष्ण को यूं ही उनका दूल्हा बता दिया था इस बात को मीराबाई सच मान गई और वह श्री कृष्ण को ही अपना सबकुछ मान बैठी और जीवन भर कृष्ण भक्ति करती रही

मीराबाई का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ हुआ मीराबाई इस विवाह के लिए तैयार नहीं थी पर परिवार के जोर देने पर मीरा को शादी करनी पड़ी विवाह के कुछ साल बाद मीराबाई के पति की मृत्यु हो गई पति की मौत के बाद उस समय प्रचलित कथा के अनुसार मीरा को भी पति भोजराज के साथ सती करने का प्रयास किया गया लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हुई

धीरे-धीरे मीराबाई संसार से मोह माया छोड़ साधु संतों के साथ कीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगी मीरा मंदिरों में जाकर कृष्ण भक्तों के सामने कृष्ण की मूर्ति के समक्ष घंटों तक नाचती रहती मीराबाई कृष्ण भक्ति का यह तरीका उनके ससुराल वालों को अच्छा नहीं लगा उनके परिजनों ने कई बार मीरा को विष देकर मारने की कोशिश भी की पर भगवान कृष्ण की कृपा से हमेशा बच जाती जब याचनाए मीराबाई के बर्दाश्त से बाहर हो गई तो उन्होंने चित्तौड़ छोड़ दिया

पहले मेड़ता गई लेकिन जब उन्हें वहां भी संतोष नहीं मिला तो उन्होंने कृष्ण भक्ति के केंद्र वृंदावन का रुख कर लिया वृंदावन में कुछ साल रहने के बाद मीराबाई द्वारका चली गई ज्यादातर लोगों का मत यही है यहां पर वह कृष्ण भक्ति करते-करते श्री कृष्ण की मूर्ति में समा गई

मान्यता है कि मीराबाई पूर्व जन्म में मथुरा की गोपीका थी उन दिनों राधा की प्रमुख सहेली थी और मन ही मन श्री कृष्ण से प्रेम करती थी बाद में राधा की सहेली का विवाह करा दिया गया उसकी सास को जब इस बात का पता चला तो उस गोपीका को घर में बंद कर दिया गया कृष्ण से मिलने की तड़प में उस गोपी ने प्राण त्याग दिए और अगले जन्म में मीराबाई के रूप में जन्म लिया मीराबाई ने कृष्ण से अपने इस प्रेम का उल्लेख अपने एक दोहे में भी किया है 

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई

जाके सिर मोर मुकट मेरो पति सोई||