गुरु नानक जयंती 19 नवंबर (शुक्रवार) को है। दुनिया को भाईचारे और मानवता का असल मतलब समझाने में अपना पूरा जीवन त्यागने वाले सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के आखिरी 18 वर्ष करतारपुर साहिब में बिताए थे। पाकस्तिान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के पास स्थित तलवंडी गांव, जिसे अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है, में 1469 ईसवी में जन्मे गुरु नानक ने मानवता की भलाई में हर तरह से योगदान दिया। गुरु नानक देव जी के जीवनवृत पर शोध करने वाली डॉ. मनजीत कौर बताती हैं कि गुरु नानक देव जी का बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता था। वह शुरू से ही अध्यात्म और ईश्वर की प्राप्ति में रुचि रखते थे।

एक दिन उनके पिता कल्याणचंद (मेहता कालू) ने उन्हें पढ़ाई के लिए पंडित जी के पास भेजा तो पंडित जी ने उन्हें ओम लिखने के लिए कहा, लेकिन गुरु साहिब ने ओम के आगे अंकों में एक लिख दिया, जिसके पीछे उनका भाव यह बताना था कि ईश्वर एक है। डॉ. मनजीत ने बताया, ह्ल एक बार कुछ लोगों ने गुरु नानक देव से पूछा कि हमें यह बताइए कि आपके अनुसार हिंदू बड़ा है या मुसलमान तो गुरु साहिब ने उत्तर दिया, ‘अवल अल्लाह नूर उपाइया कुदरत के सब बंदे, एक नूर से सब जग उपजया कौन भले कौन मंदे। यानी सब इंसान ईश्वर के पैदा किए हुए हैं, न तो हिंदू कहलाने वाला भगवान की नजर में कबूल है, न मुसलमान कहलाने वाला। रब की निगाह में वही बंदा ऊंचा है जिसका अमल नेक हो, जिसका आचरण सच्चा हो।

गुरु साहिब ने यह भी कहा कि कर्मों के बिना दोनों का जीवन व्यर्थ है।  डॉ. मनजीत बताती हैं कि गुरु नानक देव जी का करतारपुर साहिब से काफी जुड़ाव रहा। 1521 ईसवी में गुरु नानक देव जी अपनी धार्मिक यात्राओं को खत्म कर करतारपुर में बस गए और अपने जीवन के अंत तक यहीं रहे। इस दौरान उन्होंने मानवता को ‘नाम जपो’ यानी ईश्वर का नाम जपते रहने, ‘किरत करने’ यानी ईमानदारी से मेहनत कर आजीविका कमाने और ‘वंड छको’ यानी अपने पास मौजूद हर वस्तु/सामग्री को साझा करने के तीन मूल मंत्र दिए, जिसका आज न केवल सिख समुदाय, बल्कि दुनिया का हर एक धर्म अनुसरण करता है।

गुरु नानक देव जी ने न केवल शिक्षाएं दीं, बल्कि स्वयं भी इसका पालन किया। उन्होंने करतारपुर साहिब में बिताए अपने जीवन के आखिरी 18 वर्षों में खेतों में हल चला कर यह बताया कि हर इंसान को अपने जीवन में मेहनत करनी चाहिए। इसी तरह उन्होंने अपनी दिनचर्या में अकाल पुरख, प्रभु परमात्मा को हर समय अपने अंग-संग माना और उसका स्मरण किया। तीसरे सद्धिांत में उन्होंने हर चीज को साझा करना सिखाया, चाहे वो धन हो या भोजन।

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